उन्होंने कहा कि अगर 8 दिनों के भीतर इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो मनसे मराठी भाषा के अधिकारों के लिए सख्त कार्रवाई करेगी.
प्रफुल्ल कदम ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से लिखा कि मराठी भाषा का सम्मान करना महाराष्ट्रियों का स्वाभिमान है.
यह सिर्फ एक भाषा का मुद्दा नहीं, बल्कि महाराष्ट्र की संस्कृति और अस्मिता से जुड़ा हुआ विषय है. उन्होंने बैंकों से यह भी अपेक्षाएं जताईं कि कर्मचारियों से लेकर ग्राहकों तक सभी को मराठी भाषा का उपयोग करने के लिए प्रेरित किया जाए. इस मौके पर मनसे के अन्य कार्यकर्ता भी उपस्थित थे, जिनमें मितेश सालवी और अर्जुन यादव प्रमुख थे.
उन्होंने भी प्रफुल्ल कदम के इस अभियान में समर्थन दिया और कहा कि मराठी भाषा का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. उनका कहना था कि अगर बैंकों में मराठी भाषा को अनिवार्य नहीं किया गया, तो मनसे इस मुद्दे को सशक्त तरीके से उठाएगी और जरूरत पड़ी तो सड़क पर उतरने से भी नहीं हिचकेगी.
प्रफुल्ल कदम ने यह भी कहा कि पिछले कुछ वर्षों में बैंकों और अन्य संस्थाओं में मराठी भाषा का इस्तेमाल घटता जा रहा है, जो महाराष्ट्र के लिए शर्मनाक है.
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकारी बैंकों में मराठी के स्थान पर हिंदी और अंग्रेजी का ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है, जो मराठी लोगों की अस्मिता पर चोट करता है.
यह मुद्दा अब न केवल मनसे, बल्कि पूरे महाराष्ट्र में चर्चा का विषय बन गया है. प्रफुल्ल कदम का कहना है कि अगर इस मामले में जल्द ही सकारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो मनसे इस पर विरोध प्रदर्शनों का आयोजन करेगी.
उनकी यह रणनीति स्पष्ट करती है कि पार्टी मराठी भाषा के संरक्षण और प्रचार के लिए किसी भी हद तक जा सकती है.
राज ठाकरे ने अपनी रैली में यह भी कहा था कि राज्य सरकार और प्रशासन को मराठी भाषा की अहमियत समझनी चाहिए और इसे शिक्षा, व्यवसाय, और सरकारी कामकाज में अनिवार्य करना चाहिए.
उनका यह बयान मराठी लोगों के बीच एक नई चेतना का संचार कर रहा है, और मनसे अब इस मुद्दे को एक आंदोलन की तरह पेश करने की दिशा में बढ़ रही है.
इस प्रकार, मनसे की ओर से बैंकों में मराठी को अनिवार्य करने का यह कदम एक बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है, जो न केवल बैंकों तक सीमित रहेगा, बल्कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में फैल सकता है.
ADVERTISEMENT